(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.6. अध्यायः 006
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
च्यवनोत्पत्ती रक्षोविनाशश्च॥ 1 ॥ अग्नेर्भृगुशापः॥ 2 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

सौतिरुवाच। 1-6-0x(33)(937)
अग्नेरथ वचः श्रुत्वा तद्रक्षः प्रजहार ताम्।
ब्रह्मन्वराहरूपेण मनोमारुतरंहसा॥ 1-6-1(938)
ततः स गर्भो निवसन्कुक्षौ भृगुकुलोद्वह।
रोषान्मातुश्च्युतः कुक्षेश्च्यवनस्तेन सोऽभवत्॥ 1-6-2(939)
तं दृष्ट्वा मातुरुदराच्च्युतमादित्यवर्चसम्।
तद्रक्षो भस्मसाद्भूतं पपात परिमुच्य ताम्॥ 1-6-3(940)
सा तमादाय सुश्रोणी ससार भृगुनन्दनम्।
च्यवनं भार्गवं पुत्रं पुलोमा दुःखमूर्च्छिता॥ 1-6-4(941)
तां ददर्श स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः।
रुदतीं बाष्पपूर्णाक्षीं भृगोर्भार्यामनिन्दिताम्॥ 1-6-5(942)
सान्त्वयामास भगवान्वधूं ब्रह्मा पितामहः।
अश्रुबिन्दूद्भवा तस्याः प्रावर्तत महानदी॥ 1-6-6(943)
आवर्तन्ती सृतिं तस्या भृगोः पत्न्यास्तपस्विनः।
तस्या मार्गं सृतवतीं दृष्ट्वा तु सरितं तदा॥ 1-6-7(944)
नाम तस्यास्तदा नद्याश्चक्रे लोकपितामहः।
वधूसरेति भगवांश्च्यवनस्याश्रमं प्रति॥ 1-6-8(945)
स एवं च्यवनो जज्ञे भृगोः पुत्रः प्रतापवान्।
तं ददर्श पिता तत्र च्यवनं तां च भामिनीम्।
स पुलोमां ततो भार्यां पप्रच्छ कुपितो भृगुः॥ 1-6-9(946)
भृगुरुवाच। 1-6-10x(34)
केनासि रक्षसे तस्मै कथिता त्वं जिहीर्षवे।
न हि त्वा वेद तद्रक्षो मद्भार्यां चारुहासिनीम्॥ 1-6-10(947)
तत्त्वमाख्याहि तं ह्यद्य शप्तुमिच्छाम्यहं रुषा।
बिभेति को न शापान्मे कस्य चायं व्यतिक्रमः॥ 1-6-11(948)
पुलोमोवाच। 1-6-12x(35)
अग्निना भगवंस्तस्मै रक्षसेऽहं निवेदिता।
ततो मामनयद्रक्षः क्रोशन्तीं कुररीमिव॥ 1-6-12(949)
साऽहं तव सुतस्यास्य तेजसा परिमोक्षिता।
भस्मीभूतं च तद्रक्षो मामुत्सृज्य पपात वै॥ 1-6-13(950)
सौतिरुवाच। 1-6-14x(36)
इति श्रुत्वा पुलोमाया भृगुः परममन्युमान्।
शशापाग्निमतिक्रुद्धः सर्वभक्षो भविष्यसि॥ ॥ 1-6-14(951)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि षष्ठोऽध्यायः॥ 6 ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-6-2 तेन च्युतत्वेन हेतुना॥ 2 ॥ 1-6-7 आवर्तन्ती सृतिं तस्याः। सृतिं मार्गं। अनुवर्त्म सृता तस्या इति पाठान्तरं॥ 7 ॥ षष्ठोऽध्यायः॥ 6 ॥


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